ब्रिक्स+ का खुद को बांडुंग की विरासत से जोड़ने का प्रयास महत्त्वपूर्ण है। 12-13 सितंबर को हुए नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के दौरान जारी साझा घोषणापत्र में ब्रिक्स+ ने कहा, “हम इंडोनेशिया के बांडुंग में हुए 1955 के एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन को याद करते हैं, जिसने समानता, स्वतंत्रता, अ-हस्तक्षेप और परस्पर लाभ सहित आम सिद्धांतों की घोषणा की थी। हम इस पर बल देते हैं कि बांडुंग भावना अधिक न्यायसंगत, समावेशी और प्रातिनिधिक बहुपक्षीय व्यवस्था के निर्माण के क्रम में एक संदर्भ और मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है।”
हालांकि इसके पहले के कुछ शिखर सम्मेलन घोषणापत्रों में भी बांडुंग सम्मेलन का उल्लेख हुआ था, लेकिन यह पहला मौका है, जब इतने स्पष्ट रूप से “बांडुंग भावना” का जिक्र हुआ हो। “बांडुंग भावना” उस दौर की याद दिलाती है, जब उपनिवेशवाद के चंगुल से नए आजाद हुए देश एक मंच पर इकट्ठे हुए और उन्होंने पंचशील के सिद्धांत पर आधारित एक नई विश्व व्यवस्था बनाने का संकल्प लिया।
वैसे पंचशील (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत) का मूल समझौता भारत और चीन के बीच 29 अप्रैल, 1954 को हुआ था। इसके बाद जब अप्रैल, 1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग में ऐतिहासिक एशियाई-अफ़्रीकी सम्मेलन आयोजित हुआ, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री झाउ एनलाई की पहल पर वहां इकट्ठे हुए तमाम देशों ने उन सिद्धांतों को अपना लिया।
बांडुंग में आयोजित वह सम्मेलन एशियाई और अफ्रीकी देशों का ऐतिहासिक मंच बना, जिससे आगे चलकर ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ की जमीन तैयार हुई थी। चीन गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सदस्य नहीं बना। इसके पीछे मुख्य कारण सोवियत संघ के साथ उसका सैन्य एवं वैचारिक गठबंधन था। तब चीन का मानना था कि दुनिया दो खेमों- साम्राज्यवाद (अमेरिका) और समाजवाद (सोवियत संघ)- में बंटी हुई है। ऐसी स्थिति में तटस्थता या गुटनिरपेक्षता का कोई वैचारिक स्थान नहीं है। उधर 1961 में जब तत्कालीन यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में हुए सम्मेलन के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना हुई, तो उसकी सदस्यता के लिए प्राथमिक शर्त यह तय की गई थी कि उसके सदस्य देश अमेरिका या सोवियत संघ में से किसी गुट का हिस्सा नहीं बनेंगे।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन को वैचारिक दिशा देने में जवाहरलाल नेहरू, इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो, यूगोस्वालिया के तत्कालीन राष्ट्रपति मार्शल योसिफ ब्रोज टीटो और मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने मुख्य भूमिका निभाई। घाना के मशहूर नेता क्वामे नक्रूमा भी इसके संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। यूगोस्लाविया अब अस्तित्व में नहीं है। वह सात भागों में बंट चुका है, जिनमें से चार देश फिलहाल नाटो का सदस्य हैं। दो नाटो का पार्टनर देश हैं, जबकि कोसोवो की अंतरराष्ट्रीय मान्यता अभी विवादास्पद है।
बहरहाल, भारत, मिस्र, और इंडोनेशिया अब ब्रिक्स+ का हिस्सा हैं। चीन इसके संस्थापक देशों में से एक है। इसलिए ‘बांडुंग भावना’ से इस समूह को जोड़ने की कोशिश का एक ऐतिहासिक संदर्भ बन जाता है। ब्रिक्स+ के सिलसिले में अक्सर इस बात पर जोर दिया जाता है कि यह किसी वैचारिक सहमति के आधार पर बना समूह नहीं है। यानी इसमें शामिल देशों का कोई समान विचारधारात्मक उद्देश्य अथवा दीर्घकालिक समान रणनीतिक दृष्टि नहीं हैं। वे अपने फ़ौरी हितों को साधने के लिए इस मंच पर एकजुट हुए हैं।
मतलब कि इसका स्वरूप किसी सियासी मोर्चे के जैसा है, जिसमें अलग-अलग मकसद वाली ताकतें तात्कालिक लाभ के लिए शामिल होती हैं। इसी कारण इस समूह के भीतर हितों के टकराव और अविश्वास की चर्चा अक्सर होती रहती है। स्वाभाविक है कि उससे इस समूह की भूमिका को लेकर भ्रम पैदा हो। इस भ्रम की सबसे नायाब मिसाल तो भारत ही है। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से ठीक पहले भारतीय विश्लेषकों ने जिस तरह के विचार जताए, उससे यह भ्रम और बढ़ा।
मसलन, कहा गया कि भारत को भीतर से इस समूह के रुख को नरम बनाए रखने के लिए काम करना चाहिए, ताकि यह पश्चिम (अमेरिका) विरोधी ठोस रुख ना अपना सके। एक विश्लेषक ने तो खुलेआम यह लिखा कि भारत को अंदर से घात करना चाहिए, ताकि चीन के प्रभुत्व वाला यह समूह अपना प्रभाव ना बढ़ा सके। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके सुरजीत भल्ला ने वकालत की कि भारत को तुरंत इस समूह से अलग होकर अमेरिका का सहयोगी बन जाना चाहिए।
ऐसी टिप्पणियों का संदर्भ समझा जा सकता है। भारत में दशकों से अमेरिका समर्थक लॉबी मजबूत रही है। जब तक ब्रिक्स उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के संवाद का मंच था, अमेरिका उसे गंभीरता से नहीं लेता था। जाहिर है, तब अमेरिकन लॉबी के लिए भी ब्रिक्स में भारत की मौजूदगी को कोई मुद्दा नहीं थी। लेकिन 2022 के बाद जब इस मंच पर अमेरिका नियंत्रित विश्व व्यवस्था- खासकर वित्तीय एवं मौद्रिक व्यवस्थाओं- का विकल्प तैयार करने की बात होने लगी और बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था की स्थापना के संदर्भ में इसकी नई भूमिका उभरती दिखी, तो सूरत बदलती चली गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ब्रिक्स+ को खुली धमकी दे चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय भुगतान की मुद्रा के रूप में डॉलर के विकल्प की तलाश करने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी उन्होंने कई बार दी है।
इस बार भारत ब्रिक्स+ का अध्यक्ष और इसके शिखर सम्मेलन का मेजबान था, तो स्वाभाविक है कि इस समूह के भीतर उसकी भूमिका पर ध्यान केंद्रित होता। भारतीय मीडिया में उपरोक्त टिप्पणियों को मिली प्रमुखता को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह चर्चा भी रही कि नरेंद्र मोदी सरकार ऐसी भरसक कोशिश कर रही है, जिससे नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से अमेरिका विरोधी कोई संदेश ना जाए। यहां जारी साझा घोषणापत्र पर नजर डालें, तो ऐसे प्रयास के स्पष्ट संकेत उसमें मिल सकते हैं।
बहरहाल, घोषणापत्र में भले कहीं अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नियमों पर अमेरिकी आक्रमणों का नाम लेकर जिक्र नहीं किया गया, लेकिन जिन अंतरराष्ट्रीय प्रवृत्तियों और सिद्धांतों का उल्लेख हुआ, उनका निशाना कहां है, इसे समझने के लिए किसी विशेष प्रयास की जरूरत नहीं है। इसी क्रम में बांडुंग भावना का उल्लेख महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
हालांकि साझा घोषणापत्र स्थायी महत्त्व का दस्तावेज होता है, फिर भी किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से क्या संदेश गया, यह सिर्फ उसमें शामिल शब्दों से तय नहीं होता। सम्मेलन जो मंच प्रदान करता है, उस पर क्या बातें कही गईं, वे भी कम अहम नहीं होतीं। इसीलिए नई दिल्ली आए कई नेताओं के भाषण महत्त्वपूर्ण रहे, जिनमें बांडुंग भावना की स्पष्ट अभिव्यक्ति होती दिखी। मसलन, रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने जो कहा, उस पर गौर करना चाहिए। उनकी बातों का सार हैः
- बहु-ध्रुवीयता और वैश्विक दक्षिण (Global South) का उदय- पुतिन ने रेखांकित किया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र पश्चिम से हटकर ‘ग्लोबल साउथ’ और ‘ग्लोबल ईस्ट’ के देशों की ओर जा रहा है। इसके मद्देनजर ब्रिक्स+ अब केवल एक विचार नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया का केंद्र बन चुका है।
- डी-डॉलराइजेशन और स्वतंत्र वित्तीय नेटवर्क- पुतिन ने सदस्य देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं (जैसे रुपया, रुबल, युवान, रियाल) में व्यापारिक भुगतान को बढ़ावा देने पर जोर दिया। कहा कि पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिकी नियंत्रण वाली SWIFT प्रणाली के राजनीतिक इस्तेमाल के कारण “निष्पक्ष, स्वतंत्र और सुरक्षित” ब्रिक्स+ के क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास अनिवार्य हो गया है। उन्होंने विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे के विकास और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के मकसद से न्यू डेवलपमेंट बैंक (ब्रिक्स बैंक) को और मजबूत करने का आह्वान किया।
- वैश्विक आपूर्ति शृंखला और ऊर्जा सुरक्षा- पुतिन ने इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) और उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) जैसे वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों के विकास पर जोर दिया, जो एशिया, यूरोप और रूस को अधिक सुरक्षित तरीके से जोड़ सकते हैं।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने शिखर सम्मेलन और मीडिया इंटरव्यू के दौरान एकतरफा पश्चिमी प्रतिबंधों और गाजा-लेबनान संकट पर वैश्विक चुप्पी पर तीखा प्रहार किया। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की खुलेआम वकालत की। गौरतलब है कि इन नेताओं ने किसी का नाम लेने से परहेज नहीं किया।
- पेजेश्कियान ने गाजा और लेबनान में जारी मानव संहार का मुद्दा उठाते हुए कहा कि अगर सैन्य आक्रामकता और वहां की मौतों पर कोई प्रभावी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया नहीं होती है, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की बात बेमानी है। उन्होंने ब्रिक्स+ से फिलस्तीनी लोगों के आत्म-निर्णय के अधिकार का समर्थन करने और फिलस्तीनी इलाकों पर जारी कब्जे को खत्म कराने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
ये वो बातें हैं, जिनका संदेश नई दिल्ली से दिया गया और अनुमान लगाया जा सकता है कि इनकी ध्वनियां अपने लक्ष्य तक पहुंची हैं। इस तरह की बातों के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच मिलना अपने-आप में महत्त्वपूर्ण है।
बहरहाल, ब्रिक्स+ की भूमिका गुटनिरपेक्ष आंदोलन से इस रूप में अलग भी है कि तब उस मंच पर इकट्ठा हुए 100 से ज्यादा देश उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद से मुक्त नई विश्व व्यवस्था बनाने का इरादा तो जताते थे, लेकिन तब उनके पास कोई वैकल्पिक पहल करने की क्षमता नहीं थी। अब कई देशों में वह क्षमता है और कम-से-कम चीन, रूस और ईरान में ऐसा करने की इच्छाशक्ति भी है। नई दिल्ली में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स+ सहयोग को गहरा के लिए जिन पांच इनिशिएटिव्स (पहल) की रूपरेखा सामने रखी, उसे इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
- ओपन सोर्स और समावेशी एआई पहलः शी ने कहा कि चीन ब्रिक्स+ एआई ओपन सोर्स समुदाय की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाएगा, एलएलएम मॉडलों के विकास और उपयोग को बढ़ावा देने में सहयोग करेगा, विशेष एआई सेमिनार और प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित करेगा, तथा एआई के लिए एक ओपन इकॉसिस्टम तैयार करेगा।
- व्यापार और निवेश सुविधा पहलः चीन ने ब्रिक्स+ स्पेशल इकॉनोमिक जोन स्थापित करने में साझेदारी का प्रस्ताव रखा, जिसके तहत देश इंटेलिजेंट पोर्टल बना सकते हैं, नीतियों में समन्वय कायम कर सकते हैं, और खुले विकास के लिए एक नया क्षेत्र तैयार कर सकते हैं। चीन अगले वर्ष BRICS Forum on Trade in Services का आयोजन करेगा।
- डिजिटल उद्योग सहयोग पहलः चीन ब्रिक्स+ डिजिटल इकॉसिस्टम क्लाउड प्लेटफ़ॉर्म स्थापित करने को बढ़ावा देगा, डिजिटल कौशल प्रशिक्षण, तकनीकी आदान-प्रदान और औद्योगिक समन्वय करेगा, ताकि साझा प्रयास से डिजिटल अर्थव्यवस्था के विकास की राह सुगम बनाई जा जा सके।
- स्मार्ट मैनुफैक्चरिंग सहयोग पहलः चीन ने ब्रिक्स+ देशों को स्मार्ट फैक्टरियां लगाने और मानकों एवं मानदंडों के विकास में सहायता देने की पेशकश की।
- विज्ञान और तकनीकी प्रतिभा विकास पहलः चीन ने ब्रिक्स+ इंजीनियरिंग संवर्धन गठबंधन स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, ताकि इंजीनियरों का साझा विकास हो और दक्षता मानकों की पारस्परिक मान्यता बन सके।
नई दिल्ली घोषणापत्र में भी ब्रिक्स+ के भीतर आर्थिक सहयोग को गहरा करने के उपायों पर ठोस बातें कही गईं हैं। मसलन, इस दस्तावेज में निम्नलिखित सिस्टम बनाने का इरादा जताया गया हैः
• स्थानीय मुद्रा में भुगतान
• तेज और सस्ता सीमा-पार भुगतान
• सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए आसान व्यापार वित्त और इनवॉइस डिस्काउंटिंग की सुविधा
• मजबूत अंतर-ब्रिक्स+ आपूर्ति शृंखलाओं की स्थापन
• डिजिटलाइज़्ड व्यापार दस्तावेज
• सीमा शुल्क सहयोग
• विशेष आर्थिक क्षेत्रों के बीच सहयोग
• बेहतर व्यापार बीमा
• सीमा-पार वाणिज्यिक विवादों का बेहतर समाधान, और
• ब्रिक्स+ कारोबारियों के बीच घनिष्ठ सहभागिता
रणनीति स्पष्ट है: ब्रिक्स+ पश्चिम के नेतृत्व वाली व्यापार और वित्तीय प्रणाली से तत्काल संबंध तोड़ने की बात नहीं कर रहा है। इसके बजाय उसने टैरिफ, प्रतिबंधों, भुगतान प्रतिबंधों और जलवायु-संबंधी मामलों में पश्चिम पर निर्भरता घटाने की दिशा आगे बढ़ने की रूपरेखा तैयार की है।
इस ओर कितनी प्रगति होगी, इस बारे में कुछ ठोस कहना संभव नहीं है। इसलिए तब बांडुंग भावना से प्रेरित गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल हुए अधिकांश देशों के शासकों की वर्गीय प्राथमिकताएं अब बदल चुकी हैं। उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से उभरे राजनीतिक नेतृत्व में संप्रभु राष्ट्रीय विकास की जो ललक तब मौजूद थी, वह अब गायब है। उसके विपरीत अब ज्यादातर देशों के शासक वर्गों ने comprador यानी साम्राज्यवादी पूंजी से जुड़कर बिचौलिये की भूमिका खुलेआम अपना ली है। इसलिए एकरेखीय दिशा में प्रगति की उम्मीद फिलहाल मजबूत नहीं है।
मगर, आस जगाने वाला पहलू यह है कि साम्राज्यवाद खुद अपने केंद्र यानी अमेरिका में आर्थिक एवं वित्तीय चुनौतियों, राजनीति ध्रुवीकरण, तथा तीखे सामाजिक विभाजन का शिकार हो गया है। उसका यह संकट हर दिन अधिक गंभीर होता दिख रहा है। इसके परिणामस्वरूप विकासशील देशों के नेतृत्व को भी अमेरिकी साम्राज्य की आक्रामक नीतियां झेलनी पड़ी हैं। इसके बीच ब्रिक्स+ उम्मीद का मंच है, जो आपसी सहयोग से संप्रभु एवं आत्म-निर्भर विकास में सहायक बन सकता है। अतः कहा जा सकता है कि जिन ठोस परिस्थितियों के कारण ब्रिक्स+ अस्तित्व में आया और क्रमिक रूप से उसकी सकारात्मक भूमिका बनी, वही उसकी प्रगति को भी रफ्तार देंगी- यह उम्मीद रखने की ठोस वजहें हैं।
(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)